देह ही देश

देह ही देश

Orient Paperbacks | ISBN: 9789386534217

  • ₹ 285.00


यद्ध की ऐसी अनेकानेक स्मृतियों में से किन स्मृतियों का चनाव किया जाये—भय, घृणा की स्मृतियाँ जो पीढ़ी-दर-पीढी विरासत में पायी जायेंगी, या वे जिन्होंने किसी के इशारे पर बलात्कारों को अंजाम तो दिया लेकिन समय के साथसाथ मासूम चीखों को भुला नहीं पाये, वे निरपराध बच्चियाँ और औरतें उनके मानसिक विचलन का कारण बनीं और घोर राष्ट्रप्रेम भी उन्हें ग्लानि से मुक्त नहीं कर सका। किसका सच प्रामाणिक माना जाये–सामूहिक बलात्कार की शिकार बनकर अपना मानसिक संतुलन खो बैठी स्त्री का सच या अपने नवजात की जान बचाने के लिए निर्वसन होने वाली का सच या एरिजोना मार्केट में देह-व्यापार में डूबती-उतराती स्त्रियों का सच! मेरी कोशिश अनकहे सन्नाटों को सुनने की। रही है, संभव है हमें उनके सुनाये आख्यानों के टुकड़ों में उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर होने वाले युद्धों और बलात्कारों की विभीषिकाएँ, आधुनिक मनुष्य के जीने और सोचने में क्या विकृतियाँ पैदा करती हैं, यह दिख जाये या इतिहास को देखने की हमारी दृष्टि में क्या किसी बदलाव की जरूरत है, इस प्रश्न से ही मुखामुखम करने की आवश्यकता महसूस करें। — इस पुस्तक से  

Book Details
Transliteration: Deh Hi Desh
Author: Garima Srivastava
Language: Hindi
Format: Paperback
Imprint: Rajpal and Sons

‘यह सिर्फ़ डायरी नहीं यात्रा भी है, बाहर से भीतर और देह से देश की, जो बताती है कि देह पर ही सारी लड़ाइयाँ लड़ी जाती हैं और सरहदें तय होती हैं ।’ — प्रो. अभय कुमार दुबे (निदेशक, भारतीय भाषा कार्यक्रम, CSDS)

‘इस डायरी में पाठक ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता है, लगता है कोई तेज़ नश्तर उसके सीने पर रख दिया गया है और पृष्ठ-दर-पृष्ठ उसे भीतर उतारा जा रहा है। हिन्दी में ऐसे लेखन और ऐसी यात्राओं का जितना स्वागत किया जाए, कम है।’ — नित्यानंद तिवारी (आलोचक व पूर्व प्रोफ़ेसर दिल्ली विश्वविद्यालय)

‘रक्तरंजित इस डायरी में जख़्मी चिड़ियों के टूटे पंख हैं, तपती रेत पर तड़पती सुनहरी जिल्द वाली मछलियाँ हैं, कांच के मर्तबान में कैद तितलियाँ हैं। यूगोस्लाविया के विखंडन का इतना सच्चा बयान हिन्दी में यह पहला है।’ — तरसेम गुजराल (वरिष्ठ रचनाकार व आलोचक)


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