
जिस प्रकार संसार में किन्हीं दो व्यक्तियों के साथ की रेखाएँ एक-सी नहीं होतीं, उसी प्रकार किन्हीं दो व्यक्तियों के हस्ताक्षर भी एक-से नहीं हो सकते। कोई अक्षरों पर सीधी लाइन खींचता है तो कोई बिना लाइन के ही अक्षर लिखता चला जाता है। किसी के अक्षरों पर टूटती हुई लाईन बढ़ती चली जाती है तो किसी के अक्षरों पर लहरियेदार पंक्ति बनती चली जाती है।
व्यक्ति के हस्ताक्षर उसके अन्तर्बाह्वा का सजीव प्रतिबिम्ब है, कागज़ पर अंकित उसका व्यक्तित्व है, जो चिरस्थाई है, अमिट है और अपने आप में उसके जीवन का सम्पूर्ण इतिवृत्त समेटे हुए है।
हिन्दी की इस सर्वप्रथम एवं प्रामाणिक पुस्तक में अनेक राजनीतिज्ञों, लेखकों, विचारकों, खिलाड़ियों एवं अन्य प्रसिद्ध व्यक्तियों के मूल हस्ताक्षर देकर पुस्तक को सांगोपांग सम्पूर्ण बनाने का प्रयास किया गया है।
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