सोचती हूँ-खुद के तखै़युल से, अपने देश से, अपने देश के लोगो से, और तमाम दुनिया के लोगों से-यानी खुदा की तखलीक से मेरी मुहब्बत का गुनाह सचमुच बहुत बड़ा है, बहुत संगीन.....
यह मुहब्बत-मेरी नज़्मों कहानियों, उपन्यासों और वक्त-वक्त पर लिखे गए मज़मूनों के अक्षरों में कैसे उतरती रही, इसी का कुछ जाय़जा लेने के नज़रिये से, मेरी कुछ रचनाओं के कुछ अंश इस पुस्तक में दर्ज हैं।..... — अमृता प्रीतम
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