
इस युग के महानतम नेता के व्यक्तिगत जीवन की अनोखी दास्तान
पहले कभी न देखी गयी सामग्री पर आधारित मंडेला के जीवन के अनकहे और अनसुने पहलुओं की दुर्लभ झाँकी
उनकी निजी डायरियों, चिट्ठियों, लेखों, भाषणों और संवादों पर आधारित
पहली बार एक लोकप्रिय अस्तित्व के अबाधित अन्तर्मन की झलक
'...यह जानना आसन है कि क्यों कुछ ही नेता नेलसन मंडेला की तरह इज़्ज़त प्राप्त करते हैं। यह राजनीती की एक महत्त्व महत्त्वपूर्ण पुस्तक है।' — शशि थरूर, हिन्दुस्तान टाइम्स
'एक "दोषपूर्ण", "घमंडी" व "साधारण" आदमी की वास्तविक ज़िंदगी की ज्यों-की-त्यों कही गई कहानी, जो अपने इर्द-गिर्द शुरु से ही बनते "जीवित संत" के मिथक को जैसे छुरी लेकर काटता प्रतीत होता है।' — बी. बी.सी. न्यूज़
'...नेलसन मंडेला ऐतिहासिक निर्णय किस प्रकार लेते थे, इस पर एक अमूल्य दृष्टिकोण। ...यह महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने रोल मॉडल के रूप में गांधी नहीं, नेहरु को स्वीकार किया। वे यह भी साफ़ कहते है कि अहिंसा को उन्होंने नीति के रूप में स्वीकार किया, सिद्धांत के रूप में नहीं।' — गार्जियन, इंग्लैंण्ड
'सबसे गहरी दृष्टि जेल में लिखे पत्रों से प्राप्त होती है। ... यहां हम अधेड़ उम्र के पति से मिलते है, जो अपनी युवा, ज़िन्दादिल पत्नी विन्नी को भाषण देता है; बाहर से निर्भय राष्ट्रीयतावादी दिखने वाला महान् नेता भीतर से चिंतित रहता है कि उसने हथियार क्यों उठाये; परेशान पिता, जो जानता है कि उसके राजनीतिक युद्ध की उसके बच्चों को कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।' — फायनेन्शल टाइम्स, लंदन
मंडेला का नाम आते ही जेहन में उनकी कई छवियां उभरती हैं। 27 साल जेल में बिताने के बाद भी यह शख्स टूटता नहीं है। अपने समाज और देश को बदलने के लिए वह हर रास्ता अपनाने को तैयार हो जाता है। कैद से आजाद होकर मुक्ति का जबरदस्त योद्धा सुलह-समझौते का समर्थक हो जाता है। एक पार्टी को बनाने के बाद राष्ट्रपति के तौर पर वह देश के अंदर लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना में जुट जाता है, विकास का प्रारूप बनाता है। राष्ट्रपति के पद से मुक्त होने के बाद भी सबको समान अवसर देने की अपनी लडा़ई जारी रखता है। इन सबके बीच हमेशा भड़कीले कपड़ों में नजर आने वाले मंडेला के जीवन की दूसरी तस्वीर भी सामने आती है, जिसमें 78 साल की उम्र में दूसरी पत्नी को तलाक देकर दो साल बाद वे तीसरी शादी रचाते हैं। नेलसन मंडेला एक इंसान के तौर पर कैसे थे, वे किन-किन बातों से प्रभावित होते थे, उनका जीवन किन चीजों से चमत्कृत होता और कब उनकी संवेदनाओं के तार झंकृत होते हैं, क्या उनका दिल परिवार के लिए कुछ करने को नहीं तड़पता? क्या वे यारी-दोस्ती के लिए वक्त नहीं निकालना चाहते थे। इस किताब में मंडेला खुद इन सवालों के जवाब दे रहे हैं। दरअसल, अपने जीवन और सियासी लड़ाई को विषय बनाते हुए मंडेला ने आत्मकथा लांग वॉक टु फ्रीडम के नाम से लिखी थी, उनमें वे अपनी चिट्ठियां, डायरी, भाषण और इंटरव्यू के जिन अंशों को शामिल नहीं कर पाए, उन्हें एकत्र करके नेलसन मंडेला फाउंडेशन ने उसे पुस्तक की शक्ल में छापा है। उसी का हिंदी अनुवाद ओरिएंट पब्लिशिंग से नेलसन मंडेला: मेरा जीवन बातों-बातों में के रूप में आया है।
पुस्तक की भूमिका में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा लिखते हैं कि "वे पूर्ण व्यक्ति नहीं रहे। आम आदमियों की तरह उनमें भी कमियां रहीं लेकिन उनकी कमियां ही हैं जो हमें प्रेरित करती हैं।" यह किताब मंडेला की सार्वजनिक छवि से अलग उनके वास्तविक चरित्र को दिलचस्प अंदाज में पेश करती है। एक अध्याय में वे बताते हैं कि "जब भी मैं अपने पुराने लेख और भाषणों को देखता हूं तो लफ्फाजी, बनावटीपन और मौलिकता की कमी से चकित रह जाता हूं। उन भाषणों में दूसरों को प्रभावित करने और अपना विज्ञापन करने की भावना स्पष्ट झलकती है।" खुद के प्रति इससे ज्यादा ईमानदार आलोचना और क्या हो सकती है।
पुस्तक में पत्र भी शामिल हैं जो समय-समय पर मंडेला ने पहली पत्नी एवलिन, दूसरी पत्नी विनी और बेटे-बेटियों को लिखे हैं। इनमें मंडेला की, परिवार के लिए कुछ भी खास न कर पाने की बेचैनी मुखर होकर सामने आती है। मंडेला के पत्रों को पढ़ना जीवन को बेहतर बनाने के उपायों को समझने से कम नहीं है। पुस्तक का अनुवाद महेंद्र कुलश्रेष्ठ ने किया है, जिसे और सहज होना था। — इंडिया टुडे
यह किताब नेलसन मंडेला की यादों का ऐसा पिटारा है, जिसमें रोचकता भी है और कई उलझे-अन्स्ल्झे सवाल भी। किताब मंडेला की जिंदगी के अनेक अनसुने पहलुओं, उनकी निजी डायरियों, लेखों और और भाषणों आदि को समेटे हुए है। महान होते हुए भी मंडेला ने यह बताने की कोशिश की है कि उनमें भी आम आदमियों जैसी कई कमियां मौजूद हैं। उनके तीन दशक के कारावास ने किस तरह एक नए अफ्रीका की नींव रखने का रास्ता तैयार किया, यह भी किताब में बताया गया है। इसमें उन्होंने अपनी जिंदगी के विभिन्न पड़ावों पर मिलने वाले अनुभवों को बांटने की सीधी और सच्ची कोशिश की है। — नवभारत टाइम्स
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