गुरु दत्त, शायद हिन्दी फ़िल्म इतिहास में एकमात्र ऐसे निर्माता हैं जिनकी फ़िल्मों ने व्यावसायिकता के दायरे में रहते हुए भी दर्शकों के मानसपटल पर अपनी एक विशेष छाप छोड़ी है। उनकी फ़िल्में, उनकी प्रतिभा की अभीव्यक्ति के साथ-साथ उनके पूरे कार्य दल की सामूहिक रचनात्मकता का प्रमाण पत्र हैं। कैमरामैन वी. के. मूर्ति, संगीतकार एस. डी. बर्मन एवं लेखक अब्रार आल्वी, ये कुछ ऐसे नाम हैं जो 'गुरु दत्त फ़िल्म्स' के अभिन्न अंग थे।
'गुरु दत्त के साथ एक दशक, अब्रार आल्वी की यात्रा' में लेखिका सत्या सरन ने निर्देशक गुरु दत्त और उनके सहायक अब्रार आल्वी के रिश्ते पर प्रकाश डाला है। प्रकाश जो किसी भी जलद पटल में छुपे रवि के दर्शन के लिये आवश्यक है! अब्रार आल्वी जैसे सूर्य को दुनिया ने अब तब कम ही देखा परखा है।
1954 में 'आर पार' के संवाद लिखते हुए अब्रार ने एक क्रांतिकारी पहल की। हिन्दी फ़िल्मों के संवाद, जो तब तक नाटकीयता और कृत्रिमता की ज़ंजीरों से जकड़े हुए थे, उन्हें पहली बार बोल चाल की भाषा में दर्शकों तक पहुँचाया गया। इसके बाद आयीं, 'मिस्टर एण्ड मिसिज़ '55 , 'प्यासा' और कागज़ के फूल'। अब्रार द्वारा लिखी गयी इन तीनों फ़िल्मों की स्क्रिप्ट किसी शोध से कम नहीं थीं। और अन्त में बतौर निर्देशक, 'साहिब बीबी और गुलाम' की आशातीत सफ़लता।
पुस्तक में उल्लास के साथ, उस व्यथा-वेदना का भी मामिर्क चित्रण है जो इन दोनों मित्रों ने भारतीय फ़िल्म इतिहास की महान फ़िल्मों का निर्माण करते हुए अनुभव की थी!
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